जय जय चारों साहिबजादे
जय जय चारों साहिबजादे
कोटि-कोटि नमन मेरा बलिदानी साहिबज़ादों को।
जुल्म सहा,बलिदान दिया,छोड़ा न अपने इरादों को।।
थी 20 दिसंबर, सर्द रात बारिश भी हो रही जोरदार।
आनंदपुर साहिब किला छोड़ चल दिए गुरुजी ले परिवार ।।
1704 ईसवीं सन, वह रात भयानक थी काली ।
400 सैनिक संग में गुरु जी, करते परिवार की रखवाली ।।
25 किलोमीटर चलकर जब पहुंचे सरसा नदी के तट।
मुगलों की सेना आ धमकी हो गई समस्या बहुत विकट ।।
हुए अचानक हमले से फैल गई अफरा तफरी।
परिवार व सैनिक मारे गए कुछ निकल गई नदिया गहरी।
उस रात गुरु जी के संग में साहिबज़ादे अजीत और जुझार।
सैनिक बस 40 शेष रहे, इन पर ही सब दारोमदार।।
चमकौर का दूसरा युद्ध हुआ सैनिकों ने वीरगति पाई।
संग अजीत,जुझार शहीद हुए, दुश्मन को पीठ ना दिखलाई ।।
मुगलों ने बंदी बना लिये जोरावर फतेह माता गुजरी।
खूब डराया बदलो धर्म, ना लाल डरे नहीं माता डरी।।
साहिबजादे रहे निडर,कहा हम धर्म न छोड़ेंगे अपना।
सुन ले नवाब तू कान खोल, मत देख कोई ऐसा सपना।।
जिंदा दीवार में चुने गए हंसते-हंसते दोनों भाई।
ना अपना धर्म तजा तिल भर, इन्होंने भी वीरगति पाई।
इतना करके भी विधर्मियों को थोड़ी सी लाज नहीं आई।
फतेहगढ़ किले की दीवार चढ़ा, माता गुजरी जी फिंकवाई।।
हो गई बलिदान माता जी भी,हे प्रभु क्या मंजर दिखलाया।
बलिदानी हुआ परिवार सारा,अद्भुत है प्रभु तेरी माया।।
है कोटि नमन उन चरणों में जो प्राण धर्म पर वार गए।
हैं धन्य गुरु गोविंद सिंह जी बोले,हैं हजारों अभी चार गए ।।
जय जय चारों साहिबजादे,जय मां गुजरी का बलिदान ।
ऐसे ही वीरों के दम पर हिंदुत्व सुरक्षित हिंदुस्तान।
हम सभी ऋणी उन वीरों के उनको हम शीश झुकाते हैं।
जिन बलिदानों के बल पर हम सब गर्व से हिंदू कहते हैं।।
- डॉ.अनिल शर्मा 'अनिल'
धामपुर ,9719064630
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